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मैंने जितने प्लॉट बिगड़ते देखे हैं, हर एक इन छह जाँचों में से किसी एक पर बिगड़ा, और इनमें से हर जाँच में एक दिन से कम लगता है। यह वह क्रम है जिसमें मैं इन्हें करता हूँ, किसी के टोकन देने से पहले, अयोध्या, लखनऊ या गोरखपुर, कहीं भी।
छह जाँचें, इसी क्रम में
- खतौनी। बेचने वाले का नाम, सही खसरा नंबर, रक़बा और ज़मीन की श्रेणी।
- नक़्शा। गाँव के नक़्शे पर खसरा वही प्लॉट है जिस पर आप चले।
- भार-मुक्ति। सब-रजिस्ट्रार दफ़्तर में उस पर कोई क़र्ज़, बंधक, कुर्की या लंबित बिक्री नहीं।
- दाख़िल-ख़ारिज। पिछला हस्तांतरण राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है।
- भू-उपयोग। मास्टर प्लान के अनुसार ज़मीन किस काम की है।
- रेरा। प्लॉटेड प्रोजेक्ट है तो पंजीकरण नंबर और ले-आउट।
1. खतौनी: मालिक कौन है, और ज़मीन किस तरह की है
खतौनी गाँव का अधिकार अभिलेख है। इसे राजस्व विभाग रखता है और अदालत सबसे पहले इसी को देखती है। दो तरह से लें: पहली नज़र के लिए यूपी भूलेख से ऑनलाइन प्रति, और फ़ाइल के लिए तहसील से प्रमाणित प्रति।
इस पर चार चीज़ें पढ़ें। नाम: बेचने वाले का ही हो, पिता, भाई या किसी कंपनी का नहीं, और कई नाम हों तो हर एक को दस्तख़त करना होगा। खसरा नंबर और रक़बा: जो प्लॉट आपको बेचा जा रहा है वह एक खसरा या उसका तय हिस्सा हो, और रिकॉर्ड का रक़बा अनुबंध का रक़बा हो। श्रेणी: वह कॉलम जो बताता है कि ज़मीन किस तरह की है। ग्राम सभा, बंजर, चरागाह, तालाब, सीलिंग अधिशेष या वन जैसे शब्दों का मतलब है कि ज़मीन आपको बेची ही नहीं जा सकती; क्या नहीं ख़रीद सकते वाली अलग गाइड हर एक को समझाती है। और टिप्पणी, जहाँ कभी-कभी लंबित मुक़दमा, बंधक या हस्तांतरण पर रोक दिखती है।
2. नक़्शा: काग़ज़ पर और ज़मीन पर वही प्लॉट
खसरा नंबर गाँव के नक़्शे (भू-नक़्शा) पर एक नंबर है। नक़्शा निकालें, नंबर ढूँढें, और बेचने वाले के साथ सीमाओं पर चलें। प्लॉट सड़क की ग़लत तरफ़ से, पड़ोस के खसरे से, या पूरा बताकर बिकते हैं जबकि बेचने वाले के पास हिस्सा होता है। अयोध्या में यह उन सड़कों पर सबसे ज़्यादा मायने रखता है जो चौड़ी हुई हैं, क्योंकि रिकॉर्ड और ज़मीन में नई सड़क की चौड़ाई जितना फ़र्क़ हो सकता है।
3. भार-मुक्ति: उस पर क्या पंजीकृत है
किसी संपत्ति पर हर पंजीकृत दस्तावेज़ उस तहसील के सब-रजिस्ट्रार दफ़्तर में दर्ज है: बिक्री, बंधक, बिक्री के अनुबंध, अदालती कुर्की। पिछले बारह-तेरह साल की खोज बताती है कि खसरे पर क्या-क्या पंजीकृत हुआ। खोज ख़ुद या वकील के ज़रिए करवाएँ; बेचने वाले की प्रति पर भरोसा न करें। आईजीआरएसयूपी की ऑनलाइन सूची नाम और गाँव से दस्तावेज़ ढूँढने में मदद करती है, पर भरोसा दफ़्तर की खोज पर ही करें।
आप वह ढूँढ रहे हैं जो आपको बताया नहीं गया: ज़मीन पर अब भी चल रहा क़र्ज़, किसी और से पहले हुआ बिक्री अनुबंध, वारिसों में बँटवारा जो कभी पूरा नहीं हुआ।
4. दाख़िल-ख़ारिज: रिकॉर्ड पिछली बिक्री तक पहुँच चुका है
पंजीकृत बैनामा मालिकाना हक़ हस्तांतरित करता है। राजस्व रिकॉर्ड अपने आप नहीं बदलता; ख़रीदार तहसील में दाख़िल-ख़ारिज का आवेदन करता है, और सूचना व आपत्तियों के बाद खतौनी बदलती है। तब तक खतौनी पुराने मालिक को ही दिखाती है।
आपके बेचने वाले ने प्लॉट ख़रीदा और कभी दाख़िल-ख़ारिज नहीं करवाया, तो आप उससे ख़रीद रहे हैं जिसे रिकॉर्ड जानता ही नहीं। दस्तख़त से पहले बेचने वाले से दाख़िल-ख़ारिज पूरा करवाएँ। आवेदन उसका है और देरी भी उसकी, आपकी नहीं।
5. भू-उपयोग: प्लॉट को क्या बनने की इजाज़त है
खतौनी बताती है कि राजस्व रिकॉर्ड में ज़मीन क्या है। मास्टर प्लान बताता है कि विकास प्राधिकरण आपको क्या बनाने देगा। कोई प्लॉट रिकॉर्ड में कृषि हो और मास्टर प्लान के रिहायशी क्षेत्र में हो, या रिहायशी बताकर बिके और ग्रीन बेल्ट में हो। अयोध्या में संदर्भ एडीए का मास्टर प्लान है; लखनऊ में एलडीए का; गोरखपुर में जीडीए का। इस साइट का हर इलाक़ा पेज मिला हुआ भू-उपयोग स्रोत के साथ बताता है, जैसे फैजाबाद रोड:
- ₹12,000 प्रति वर्ग मीटर
- रिहायशी
- ₹24,000 प्रति वर्ग मीटर
- व्यावसायिक
- ₹45,00,000 प्रति हेक्टेयर
- कृषि
रिकॉर्ड में कृषि दर्ज ज़मीन पर घर बनाने से पहले यूपी राजस्व संहिता की धारा 80 के तहत घोषणा चाहिए। भू-उपयोग बदलने की गाइड (अंग्रेज़ी में) बताती है कौन आवेदन कर सकता है और ख़र्च कितना है।
6. रेरा: अगर प्लॉटेड प्रोजेक्ट है
500 वर्ग मीटर से बड़ा या आठ से ज़्यादा प्लॉट वाला ले-आउट बेचने से पहले यूपी रेरा पंजीकरण चाहिए। नंबर माँगें, यूपी रेरा की साइट पर जाँचें, और प्लॉट नंबर को स्वीकृत ले-आउट से मिलाएँ। बिना नंबर की "कॉलोनी" क़ानून के बाहर बिक रही है, गेट चाहे जितना सुंदर हो।
सुरक्षित कैसा दिखता है
खतौनी, नक़्शे और अनुबंध पर एक ही नाम। ऐसी श्रेणी जो हस्तांतरित हो सकती है। साफ़ खोज। दाख़िल-ख़ारिज पूरा। भू-उपयोग वही जो आप बनाना चाहते हैं। ले-आउट है तो रेरा नंबर। जब ये छह मिल जाएँ, तो प्लॉट उतना ही सुरक्षित है जितना यूपी में कोई प्लॉट हो सकता है; बाक़ी दाम की बात है। सिविल लाइंस, मिसाल के तौर पर, एयरपोर्ट से 2.7 किमी है और फैजाबाद रोड से ऊँची श्रेणी में है, और दोनों की जाँचें एक जैसी हैं।
छह में से कोई एक न मिले, तो भी कभी-कभी ख़रीद सकते हैं, पर समस्या का दाम घटाकर और बैनामे से पहले लिखित में ठीक करवाकर। हमें खसरा नंबर भेजिए, हम बताएँगे आप किस स्थिति में हैं।
लोग जो पूछते हैं
- खतौनी ऑनलाइन कहाँ देखें?
- यूपी भूलेख (upbhulekh.gov.in) पर: ज़िला, तहसील और गाँव चुनें, फिर खसरा नंबर या मालिक के नाम से खोजें। ऑनलाइन प्रति जाँच के लिए है; दस्तख़त से पहले तहसील से प्रमाणित प्रति लें।
- खतौनी और खसरा में क्या फ़र्क़ है?
- खसरा गाँव के नक़्शे पर प्लॉट का नंबर है। खतौनी अधिकार अभिलेख है जिसमें लिखा है कि कौन किस खसरा नंबर का, किस श्रेणी में, कितने रक़बे का मालिक है। दोनों जाँचें: नक़्शे पर नंबर और उसके सामने नाम।
- भार-मुक्ति की खोज कितने साल पीछे तक करें?
- सब-रजिस्ट्रार दफ़्तर में बारह से तेरह साल की खोज आम चलन है, जो ज़्यादातर दावों की समय-सीमा को ढकती है। मालिकाना हक़ की कड़ी में कमी हो तो और पीछे।
- बेचने वाला कहता है दाख़िल-ख़ारिज लंबित है पर बिक्री हो सकती है। क्या यह ठीक है?
- नहीं। पिछला हस्तांतरण खतौनी में दर्ज नहीं है तो राजस्व रिकॉर्ड अब भी पुराने मालिक को दिखाता है। बेचने वाले से पहले दाख़िल-ख़ारिज पूरा करवाएँ; आवेदन उसका है, आपका नहीं।
